मगर अब अच्छा नहीं लगता हैं

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कुछ अपनी बात कहने को
कुछ यादें दोहराने को
ये पागलपन की बातें सी
दिसंबर सर्द रातों सी
दिन को रात कहने को

बहोत अरमान हैं मेरे
कुछ ज़ुल्फ़ों को संजोने के

मगर मैं क्या करूं जानां
तुम्हे अच्छा नहीं लगता

कसक जब उठती सीने में
हलक में आ के फंसती है
जख़्मी एक हिरन जैसी
सांसें मंद पड़ती हैं
तुम्हारी याद की शमा
हौले से बुझने लगती है

तब मैं क्या करूं जानां
मुझे अच्छा नहीं लगता

जरा सिहरन सी उठती है
ख्वाबों के दरीचों से
मुहब्बत चंद लम्हों का
अजब सा खेल लगता है

ज़हन भी डगमगाता है
शज़र भी थरथराता है
बूंदे रूह पे पड़ती हैं
सधे इक तीर के जैसी
सीधे दिल पे लगती हैं
तब इस मौसम की साजिश में
तुम्हे बाहों में कसने को
कस कर भींच लेने को
तुम्हारे शबनमी लब को
लबों से चूम लेने को
मेरा मन झूम उठता है

मगर अब क्या करूं जानां
तुम्हें अच्छा नहीं लगता

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