सपने देखने वाली स्त्री

74

क्या देखा है कभी
उस साजिश को,
जहां, शक्ति कहकर
बना दिया जाता है ‘निःशक्त’
एक स्त्री को,
वैसे,
निःशक्त कभी नहीं रही ‘स्त्री’
अबला कहकर,
नाज़ुक बदन देखने वालों
हिम्मत जुटाकर
कभी,
देखिए, उसकी आँखों में
डर गए..?
आइए ,मैं दिख़ाता हूँ
एक स्त्री,
जिसके, पैरों में पायल हो
या कि काला धागा,
दिमाग से तोड़ चुकी है वह सारी जंज़ीरें,
बैठा लिया है एक सपना
जो ,सोते हुए नहीं
देखा गया है खुली आँखों से,
सपने के पीछे
छिपे रहते हैं कई दर्द भी,
दर्द के रेशों से
बुने जाते हैं,
सपने,
मज़बूत और सुनहरे।
सपने देखने वाली स्त्री की
बातों के सलीके से,
हाथ मिलाने के अंदाज़ से,
खामोश रहने पर
उसकी आँखों से
दिख जाता है उसका आत्मविश्वास,
नहीं फ़र्क पड़ता
कौन है साथ, कौन नहीं है?
उसकी निगाहें,भेदती रहती हैं
अपने लक्ष्य को,
पल-पल, प्रतिपल
ये आंखें नहीं पढ़तीं
केवल किताबें,
ये पढ़ लेती हैं,
चेहरे पर लिखे भावों को भी
चेहरा परिचित हो
या अपरिचित।
सपने देखने वाली स्त्री,
प्रेम भी करती है
पश्चाताप भी,
हंसती भी है और रोती भी,
ज़िंदगी के साथ
कदम दर कदम तालमेल बिठाती है,
मगर,
अपने सपनों के साथ समझौता नहीं करती।

नवीन सिंह
शोधार्थी, पी-एच.डी, हिंदी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी।
एम.फिल (2016-17)- महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा,
एम.ए (2014-16) – जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।
ईमेल- [email protected]

Leave a Reply